देहरादून: मुख्यमंत्री हरीश रावत की अभिनव पहल के तहत सोमवार 17 अगस्त, 2015 को केन्ट रोड स्थित मुख्यमंत्री आवास पर ‘‘घी संग्रांद, एक सवाल एक सुझाव‘‘ के साथ ही झूमेलो एवं लोक गीत संध्या का भी आयोजन किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री श्री रावत द्वारा पर्वतीय राज्य की अवधारणा के अनुरूप राज्य की लोक परम्पराओं की विभिन्न विधाओं को आम आदमी तक पहंुचाने के लिए किये जा रहे सामाजिक प्रयासों को व्यापक रूप से सराहना मिली है। चाहे हरेला पर्व को पर्यावरण से जोड़कर वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का कार्य हो अथवा राज्य की स्थानीय भाषा, बोलियों, लोक गीतो, लोक कलाओं, लोक वाद्यो को माध्यमिक कक्षाओं में अतिरिक्त विषय के रूप में सम्मिलित करने का विषय हो या प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं लोक परम्पराओं के संरक्षण व संवर्द्धन के लिये किये जा रहे प्रयास हो। जन सरोकारों से जुड़ी इन योजनाओं ने पहाड़ के सच्चे सेवक के रूप में उनकी पहचान बनी है।
घी संग्रांद के पर्व को भी व्यापक स्तर पर आयोजित करने के प्रयासों में भी अपनी परम्पराओं से जुड़ने का संदेश निहित है। यह पर्व भी हरेला पर्व की भांति ही ऋतु आधारित पर्व है। यह पर्व कृषि के साथ ही पशुधन से भी जुड़ा हुआ है। वह वास्तव में मानव और पशुआंे के बीच पारस्परिक संबंधों का भी पर्व है। पहाड़ों में बरसात के मौसम में हरी घास और चारा पशुओं को बहुधा उपलब्ध रहता है। जिससे पर्याप्त मात्रा में पशुधन (दूध-दही-घी) प्राप्त होता है। इस पर्व में उनसे प्राप्त दूध, दही, घी को इस्तेमाल किया जाता है। इस दिन दाल की भरवां रोटियां विशेष रूप से तैयार कर शुद्ध घी के साथ खाई जाती है। किसी न किसी रूप में इस दिन घी खाना अनिवार्य माना जाता है।
मुख्यमंत्री श्री रावत का मानना है कि उत्तराखण्ड का अन्न धन प्रदेश की ही नही देश के भोजन का भी हिस्सा बनें, तथा राज्य के इस प्रयास में सभी शामिल हों। उत्तराखण्ड के भोज्य पदार्थों को हमारे होटलों, अतिथि गृहों और पर्यटन को परिष्कृत करने वाले सरकारी प्रतिष्ठानों के मेन्यू में स्थायी स्थान मिले। उन्होने विश्वास व्यक्त किया है कि हमारे उत्पाद देश व दुनिया में उत्तराखण्ड को विशिष्ट पहचान दिलाने के साथ ही पर्वतीय कृषि की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने में भी मददगार होंगे।