देहरादून: राष्ट्रीय स्तर पर हाईड्रो पावर को लेकर नीति बनाई जानी चाहिए। जो नियम उत्तराखण्ड की जलविद्युत परियोजनाओं के लिए लागू किए जाने की बात कही जाती है वही नियम अन्य प्रदेशों की जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भी होने चाहिए। एक स्थानीय होटल में सीएनएफसी मीडिया लिमिटेड द्वारा आयोजित उत्तराखण्ड पावर कान्क्लेव 2015 में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड में जलविद्युत की अपार सम्भावनाएं होते हुए भी हमें लगभग 1200 करोड़ रूपए प्रतिवर्ष बिजली खरीदनी पड़ रही है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य के लिए यह स्थिति सही नहीं कही जा सकती है।
मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास में जलविद्युत की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता है। बिजली आज प्राथमिक आवश्यकता है। विकास के लिए आवश्यक सभी तत्वों को ध्यान में रखना होगा। हमें प्रतिवर्ष लगभग 20 प्रतिशत अतिरिक्त बिजली की आवश्यकता होगी। राज्य के पास विकल्प केवल यही है कि या तो अपने संसाधन विकसित करें या बाहर से बिजली क्रय करें। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य के लिए प्रतिवर्ष 1200 करोड़ रूपए की बिजली खरीदना महंगा है। आपदा में बांधों की भूमिका पर बोलते हुए सीएम ने कहा कि अभी तक ऐसा कोई ऐविडेंस नहीं मिला है कि बांधों के कारण वर्ष 2013 की दैवीय आपदा आई थी। तथ्य तो ये है कि टिहरी बांध के कारण आपदा की तीव्रता कम हो गई थी। आईआईटी रूड़की, वाडिया इंस्टीट्यूट, नेशनल वाटर कमीशन सहित अनेक विशेषज्ञ संस्थाओं ने इस बात को माना है। जो लोग उत्तराखण्ड में जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध करते हैं, उन्हें इसका विकल्प भी प्रस्तुत करना चाहिए। राज्य सरकार ने अपनी नई माईक्रो हाईड्रो पावर पालिसी में ग्राम पंचायतों की भागदीारी से छोटी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण की पहल की है। ग्राम पंचायतों को इसके लिए आगे आना चाहिए।
मुख्य सचिव एन रविशंकर ने कहा कि विकास व पर्यावरण में संतुलन आवश्यक है। हमें एक बात पर ध्यान देना होगा कि आर्थिक विकास ऊर्जा उत्पादन पर निर्भर करता है। आर्थिक विकास के लिए चार ई- एनवायरमेंट, एनर्जी, इकोनोमी व ई-कनेक्टीवीटी को प्राथमिकता देनी होगी। कान्क्लेव में सचिव ऊर्जा डा.उमाकांत पंवार, सीएनएफसी की एमडी जूही राजपूत सहित अन्य विशेषज्ञ उपस्थित थे।